बिरह अगन
बिरह अगन
बिरहा अगन बडी भारी।
प्रितम तौ बिनु जरत जरत,देह भई आँच पिटारी।
बहिर शीतल भीतर जरिहै,ज्यौ होय राख को ढेरी।
करू कहो काज कौन जो पावू,निर्मोही प्रीतम संग।
काढ करेजो कैसौ दिखावू,नाय करि सकू जीवन भंग।
आवो कदि नाय जीवतौ पावौ,भयौ न आप उदास।
जेहि कारज पिय रोकिहै नाय,ऐही आवन जावन श्वास।
ले कटार आप ही आवौ,कर देऔ लीला समाप्त।
नाही सह सकू बिनु प्रीतम,हिय बिरह अगन संतप्त।
कैसौ रहू बिनु आप स्वामी,बतावो आप ही आय।
प्यारी नाय तरसावो अब जी,बेगि लगावो हिय सो लगाय।
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