बन चाकर रहूँ
बन चाकर रहू
मैरो गिरधर जी बन चाकर रहू थारी।
उठत भौर हि प्रेम सौ जगावू,मुखेै कर कमल जल सुवसित धुलावू।
माखन लौना कलेवा करावू,जल शीतल सुगंधित बीरी खिलावू।
कुनमुने जल सौ स्नान करावू,बदन मलि मलि उबटन कौ लगावू।
चोला सुंदर रंग सुरंग धरावू,भूषण भाँति भाँति नगा पहिरावू।
लै पकरि चंदन बैठाय चौकी,मोतिन सजाय थाल आरती उतारू।
प्यारी कौ गिरधर आसरौ तिहारौ,थारे ही संग दिन रैन बतियावू
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