त्वयि रोग औषधय वेध उपचारम
त्वयि रौगौषध: वैद्य उपचारम्।
प्रणय रौष भयऽभय मधुरम्।
अन्तरहृदयै त्वं भाव अपारम्।
जानामि त्वं च त्वं गुण रूपम्।।८।।
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तुम्ही तो मेरे हृदय के रोग (प्रेम एक रोग ही तो),उस रोग की औषधि ,उस औषधि को देने वाले वैद्य और इस वैद्य द्वारा किये जाने वाले उपचार भी तो तुम्ही हो।
मेरे अंतर्मन मे प्रतिपल उठते नवीन अंतहीन भाव जैसे प्रणय,क्रोध(जब तुम कोई बात न मानते तब जो मै झूठमूठ क्रोध करती तुम पर वह),भय(तुमसे दूर हो जाने का डर,कही तुम छोड न जाओ यह डर),अभय(तुम मेरे हो तो बस कोई ओर कुछ भी कहे कहता रहे हे,संग रहे अथवा छोड जाए हमे क्या डर) मधुर(तुमसे मिलन) आदि सब तुम्ही तो हो।
और इस प्रकार मेरे प्यारे जु,मै तुम्हारी प्यारी तो केवल और केवल आपको और आपके गुण(आपके नयन,आपकी मुस्कान,आपके श्रृंगार) आपके रूप को ही जानती हूँ,मेरे तो सर्व सर्वस्व आप ही है।
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