ज्ञान गुदड़ी
ज्ञान गूदडी
गूदडी बंधी ज्ञान तज दी।
प्रेम गठरिया धरी शीश पै,ऐकौ धर लीन्ही।
कूप फैकिहै ज्ञान कौ पौथी,प्रीत रोम रोम भरीही।
कहाँ धरीहै ग्यान कौ गठरी,रहवै दुई नाय कबहु संग री।
प्रीत ही सुनहु प्रीत ही दैख्यू,प्रीत ही सुनु अब री।
ग्यान झुकायै शीशही निकरू,प्रीत कर सौ पकर लीन्ही।
प्यारी कौ गिरधर प्रीती साँवरौ,ग्यान समुझै बौरी नायही।
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