रास लीला
रास लीला
शरद ऋतु रास रसिक खैलि।
सुनत मुरली मधुरै कृष्णा,दौरत आयीहि गोपिन कुंज मैलि।
जमुना पुलिन रचै रास सुंदर,बढिहि देखिहौ प्रीत बैलि।
गोपिन अनगिन कृष्ण उतनेई,नव कुंज डारत बाँह गैलि।
मध्यै रासेश्वरी कृष्ण संगै,भौह मटकन ताल थिरक दैलि।
गौल कार ताराकृति कदै,बनावतौ भिन्न भिन्न कृति रैलि।
श्यामा कृष्ण पूरन चंद्र,तारागन गोपि नव नवैलि।
मिलिहै भाग सुभाग प्यारी,कदै तो मुरली धुनि सुनैलि।
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