लो फिर आ गया बसंत वही

लो फिर आ गया बसंत वही।
लो फिर......
हर बार विदा ‌वादे से किस,तुझको किया है न पता
तूने भी तो मुस्कान संग,वादा-मुहर की थी यही.....
......
ये जो गया तो सो गया,अब बार फिर आएगा जो
मनमीत संग आऊंगा मैं, फिर हो वह चाहे कही.......
......
बातों को तेरी सच समझ, फिर आस पूली बाँध कर
रस्ते को तकती रह गयी,ये मासूम नन्ही सी कली.....
......
पर फिर वही बेरंग से,लौटे हो तुम मायूस क्यूँ
हो बसंत के खोल में,पतझड़ तो तुम नही कहीं.......
.......
आया है तू होगा कहीं,हमको पता है क्या तू कहाँ
हम तो वहीं सूखे चमन,पहले भी थे अब भी वही......
....
वैसे तो मैंने देखा है,कही तुझको मचलते नाचते
मुझसे ही मिलते क्यूं तेरी,रंगत बिखर सी है गयी…....
....
तरस जरा तो कर अरे,कुछ तो खबर ले दे ले तू
"प्यारी" बरसो से लाता सिसकियां,कुछ ला सौगात अब नयी....
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"प्यारी" बरसो से लाता सिसकियां,कुछ ला सौगात अब नयी....
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बरसो से लाता सिसकियां,कुछ ला सौगात अब नयी....

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