आज बिचारत
आजु बिचारत श्री राधारमण लाल।
कौन भाति निज प्रिया रिझावू,लखू लाज भर्यौ आनन लाल।
राग रागिनि वेणू मधुर सुनावू,रीझत देय गलबैय्या ही डाल।
भाति भेष धरि नाट्य दिखावू,करू इंगित लता लिपटी तमाल।
निरत करत जानि ताल बिसरावू,आवै करन हित प्यारी सम्हाल।
देखि "प्यारी" दशा अनंग हित केलि,ऊचेई उठै पिय मिलन उछाल।
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