वृंदावन! वृंदावन! सौ ईश मेरौ वृंदावन।
वृंदावन! वृंदावन! सौ ईश मेरौ वृंदावन।
जहाँ कुंज निकुंज गहन तरु छाया,विहरत जोरि रस कानन।
बहे रसरानी जहाँ कलिन्द नंदिनी,निरखत कूल जोरि आनन।
बस जहाँ सखी कै रहै द्वौ लडैति,रहवत बनै इन प्राणन।
"प्यारी" जोरि प्राण मेरौ ईश बिरज है,साधक साध्य योई साधन।
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