बदली में जो छुपा है

बदली में जो छुपा है वो,मेरा चांद था रू-ब-रू कभी।
नहीं स्वपन सा श्वासो सा वो,मेरे संग था हू-ब-हू कभी।
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महसूस चलती सांसों में,यूं तो वो अब भी है मगर...
पर चलता फिरता श्वास में,बस तू-ही-तू था तब कभी।
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दीदार दीद-ऐ-इश्क का,यूं तो इक अरसा हमने किया....
लेकिन अधूरी प्यास का, अंजाम यूं-का-यूं रहा अभी।
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दरम्यां दीदार-ऐ-आम भी,होता दीदार-ऐ-खास सा......
पर खास-ओ इस आम का,न गया फर्क छू-के-रूह कभी।
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फिर से मुखातिब तुम से हो,दिल-ऐ-ख्वाहिशे"प्यारी"की ये.....
और ख्वाहिशो को सामने,लाने की जिद हो तुमको भी।।।।।
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और ख्वाहिशो को सामने,लाने की जिद हो तुमको भी।।।।।
और ख्वाहिशो को सामने,लाने की जिद हो तुमको भी।।।।।

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