चँचल किशोरी

चंचल किशोरी
सरस किशौरी अजहु हिय चंचल भयी।
सखी पहरावन पहरानी आपुनी,घूंघटौ काढि दयी।
निज सैजि बैठायी प्यारी,आप घेर कुंज लयी।
आवतौ मौहन पाछै पकरि,सखी लजा दूरी भयी।
जानत हौ सखीहि हौहि,तबहु छाडत नाहि रही।
मुख जबरन हौ चूमतौ,सखि सुधि बिसरात गई।
कैसौ प्रीत लाल लली,सखी मानत नाहि दुई।

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