श्रीजु छबि
श्रीजु छबि
राधिका! देख्यी छबीली छबी।
डारयौ पग कालिंदि जल भीतर,कर पकरयौ लहंगा अरी।
सुंदर सुकोमल पगहु सजै दुई,जावक पायल सौ री।
अध बाहर अध जल भीतर,खेलत जल सो ही।
प्रेम प्रतीक्षा पीय कौ करत,आवत दीखे नाही।
मनमोहनी छबी ऐसौ प्यारी पे,प्यारी बार बार ज्यै बली।
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