मन एकम एक
मन एकम एक
जो तुव चाहौ सो हमहु चाह,मनहु ऐसौ एकम एक कर दीजै।
रखिहै लीला नित पात्र कोउ मोय,लता चाहै पशु पक्छी कोउ कीजै।
रहत करत महल निज टहलहु,सेबा हित नित कर जोरि लीजै।
हसि हैरै कर शीश स्वामिनि धरै,ऐसौ प्रेमाशीश मुदित होय पीजै।
हा! किशौरी जौरि प्रीत मौरि सुनिहै,चरण शरण निज दासी कर लीजै।
हू अधमन तजै लोभ सेबा जाय नाहि,तव अधमन बिसारि नाहि दिजै।
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