सद्गुरू प्रेम जगत

सद्गुरू प्रेम जगत कौ सेतू।
रीती रस सरबस जानन-हारै,बनिहै सेवा जुगल कौ हेतू।
पारस छूवै ऐसे पारस करिहै,अनुचर महल टहल करि लेतू।
अनुगत रहू करू कहवी इनकी,"प्यारी" ठौर चरणनि इनकै च्हैतू।

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