प्रीत व्यसन

प्रीत व्यसन
प्रीत व्यसन अद्भुद अरी होहि।
व्यसन सुनि कहा अरथ कहि तो,नशा होहि मद जे होहि।
स्व बिसराय दिन्ही स्व कौ,व्यसन होय जोई स्व खोई।
मैरो तिहारौ बचिहै कछु ना,रहि जावै बचौ सब कछु तोहि।
आप बिसराय प्रीती ही हुई जाय,रहि जावै व्यसन भूलिहै सबहि।
जोई हिय बसिहै सोई बाहर दिखिहै,याद अापनो रहवे न कोई।
पहिलै कहा कहा बादहु होनौ,नाय पतौ रहिहै व्यसन सो होहि।
बिगारै सबहि ओरहु व्यसन तो,प्रीत व्यसन जगत भारी होहि।
कहा परे कौन बिधि परे हौ,कौई कछु कहवे कहवे जोई जोई।
लगिहै व्यसन प्रेम प्रीत कौ कबहु,कबहु प्यारी व्यसनी ऐसो होहि।

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