सिखावेहै टहल

सिखावैहै टहल
सिखावैहै सखी टहल जौरि कौ दासी।
धीर धरिहै रसै रंग दैखि,बहिहै नाहि सोई दासी।
दैखत बहवतौ नैन थमियै,लाइहिहै नैक ना उदासी।
हासि हसिए करिहै ठिठौली,रंगे डूबिहै रहिहै प्यासी।
बारिहै सरबस इन्है का इनपेई,सखी कहवै रहिहै दासी।
मिलईहै नित नित विधि सौहि,रैन नैन रखिहै जगासी।
प्रियाप्राण जानि लाड लडइहै,कर दीजिहै कर थमासी।
धन धन सखिजु सिखहिहै करनो,टहल सिखावै करिहै दासी

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