मन दर्पण जिन जनि होय जाय
मन दर्पण जिन जन होई जाय , तिनहु जुगल छबी छाप दिखाय।
उन उर बहत नदी रस भारी , पलहु जिन जोरि रस बिचराय।
जग झंझट ओझल हो दृगन ते , भाव राजहु ही रहि जाय।
स्वाद लगै जिन सेवा भाव को , तिन हित सेवा तजि सब धाय।
डूबै जितनौ ओरि ओरि लगै थोरा , चहै करै लाड जोरि अंक बैठाय।
सुख सेवा जोरि चहै " प्यारी " , सुमन बनि जोरि कै ढुरि पाय।
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