हित वन्दे
वन्दनम् श्री हित: तव् चरणम्।
अतीव् आत्मजा: श्रीनिकुंजेश्वरी:सर्वभुवनमोहिनी: वेर्णुस्वरूपम्।
जगत्सकलं रसौप्रेमप्रकाशिनी कर्तुंरर्सौज्जवलस्वरूप: अद्भुदवर्णनम्।
लुप्तवृंदावनक्रीडास्थलै च श्रीनवरंगीलालविग्रहै हितलौक:प्रकाशकम्।
मतिमूढऽहम् किंञ्चित्वकृपाकथम् निश्चितत्रुटिहित: "प्यारी" क्षमस्वतव्पदम्।
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भावार्थ-------------हे श्री हित हरिवंश जु आपके चरणो मे हमारा वंदन है।
-----आप हमारी निकुंजेश्वरी श्री राधा जु अत्यंत आत्मीय सखी है और सभी लोको को मोह लेने वाली वंशी की अवतार स्वरूपा है।
-------आप समस्त जगत मे प्रेम रस का प्रकाश फैलाने वाली और इसी रस के अत्यंत उज्जवल स्वरूप का वर्णन अपनी अद्भुद वाणी द्वारा करने वाली है।
---------श्री युगल सरकार की प्रेम क्रीडास्थली श्री वृंदावन के लुप्त हो गये स्थानो को पुन: प्रकट करने वाली और श्री विग्रह नवरंगी लाल जु को जग के हित के लिए प्रकाश मे लाने वाली आप ही है।
----------हे श्री हित हरिवंश जु मै जो कुछ आपकी कृपा से कह पायी हूँ मेरी मुर्ख बुद्धि के कारण उसमे निश्चित ही कोई न कोई त्रुटि रही होगी जिसके लिए यह प्यारी आपके चरणो मे क्षमाप्रार्थी है।
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