सेवा अभिलाष

सेवा अभिलाष
शोभा बरनौ कौन मुख सौ।
लगिहै सबही कछु न कछु सैबा,आवौ हमहु करवौ।
कछु दैख्यी सिंहासन सजावत,कछु लडी पुष्पन पिरावौ।
कोऊ कोउ चढ्यी पाटहु दैख्यौ,संग मिल पुष्प माल लगावौ।
कछु कौ दैख्यौ तरू तले बैठ्यी,दीप चबूतरौ सौ सजावौ।
हसत करत कछुही ठीठौली,प्यारी कुसुम माल पकरावौ।

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