अभिलाषा
अभिलाषा
सखी हम कबहु भये ब्रज रज।
कबहु हम ब्रज माही डोलै,बन बाँवर सब तज।
हमपेई नित संग पग धरै,जुगल जोरि रूचि रच।
उडि उडि अंग सबै लगै,लगिहै बसनहु रच पच।
निरत करत कबहु लाल लाडिली,धिन ता थिरक थिरक।
लागे पाम छुटावे नाय,खावै लाडिली लाल लचक।
ब्रज संतन अंग रचि जावे,जो गावे राधा नाम सतत।
लाल लली बनाईयो रज सोई,प्यारी बिनती चरणा करत।
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