प्रेम पंथ

प्रेम पंथ
सुनिहै प्रेम पंथ कैसो।
ज्यौ अगै चलिहै,पाछै पंथ मिटिहै।
पावै ठौर कुंजन,जगत सबै हटिहै।
जावतौ पंथ हौहै,लौटतौ ना पाईहै।
जौई राज पहुचे,लौटतौ न अईहै।
नित चाव टहल,जुगल हिय आईहै।
डाँटिए सखी जौ,सैबा नेकहु बिगारिहै।
कबहु प्रेम मान,सौई समुझाइहै।
निकारि नाहि सकै,टहल जुगल सौ।
जाईहै तो जाईहै,आपु बिसराइहै।
नचनी सी सैबा,करत भगि जाइहै।
जौई जौई मिलै,सौई चित्तहु ध्याईहै।
मिलै नाहि सैबा,अधीर हुई रौईहै।
कहिए सखिन सौ,सैबा दासी पाईहै।
ऐसौ हौहै किरपा,टहल जुगल करौ।
दासी और किरपा सौ,जुगल लखाईहै।

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