सजिली शौभा
सजिली शौभा
सजिली भौरी हौहि कैसी शौभा।
पट्टिका बैठी पादौ पाद धरौ,अंगुरि कर सौ कर फसाई।
घुटुनि कछु ऊँचौ रखिहै,ताई रखिहै पकर कराई।
सौहवतौ झुकी नीकौ ग्रीवा,नकबेसर हिरि झुकी जाई।
तीखौ टेढौ नयन उत ही,जित मौहन ठाडौ हुई जाई।
कोटि चंद्र शोभा रोम निकिरै,जै हि थौडौ कही नही जाई।
चित्र सौई जड सौ हौहै,रसलाल बचिहि कहा पाई।
दैखि जड प्रीत शोभा,लजा नागरि नैन झुकाई।
दैहौ दैहौ दरस जुगल हौ,नाहि कछु धीर हिय धराई।
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