न ज्ञातुम विधि वेद
न ज्ञातुम् विधिवेद न च अर्चनम्।
न साध् साधनम् नतौऽहं भजनम्।
भवभावऽभाव न अल्प न सर्वम्।
जानामि त्वं च त्वं गुण रूपम्।।१।।
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ना तो किसी विधिविधान और ना ही किसी प्रकार की पूजा अर्चना के विषय मे मुझे कुछ भी ज्ञात है।
किसी साध्य अथवा साधन और यहाँ तक की भजन क्या होता है कैसे होता है मै यह भी नही जानती प्रिय।
भव बाधा,भाव अथवा भावहीन स्थिति इन सभी के विषय मे सब कुछ तो क्या थोडा भी मुझे नही पता।
मेरे प्यारे जु,मै आपकी प्यारी तो केवल और केवल आपको और आपके गुण(आपके नयन,आपकी मुस्कान आपके श्रृंगार) आपके रूप को ही जानती हूँ मेरे तो सर्व सर्वस्व आप ही है।
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