अलक शोभा

अलक शोभा
अलक घुंघराली हिय मैरो अटक्यौ।
कारौ घुंघरारौ कछु कांधै पै पड्यौ रह्यौ।
कछु अहा देखियौ कान कुंडल अटक गयौ।
लट इक नगिनी सी अधर छूवै धाई ह्यौ।
कछुही अलक लटा कपोलन बिखर रह्यौ।
मनहर छौट्यौ लटा मुकुट कछु निकर्यौ।
ऐकौ लटा देखिहौ मुकुट मणि फसिहौ।
लटक लटा एकौ मैरौ हिय कौ फँसत रह्यौ।
रूप सुधा पीबत अघियै न प्यारी मना।
बलिहारी अलक घूंघर वारी पै ढुरि गयौ।

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