चिर बसि गई म्हारै

चिर बसि गई म्हारै नैन ऋतु पावस,फागुन बयार कबहु नाय आई।
इन कैसो असुवन जल भरयौ जानै,बहै जितनोई बढि उतनोई जाई।
दाह दहि बिरहा-नल तब सो ह्यौ , जब सौ पिय परदेस सिधाई।
तऊ धीर रहिए जौ आनि जानि चलिए,कैसो धीर रहै जई आनि-ना सुनाई।
जानू प्रेम मान मनौवन लगी रहै,जबहु हौवे कोउ अवधि सुझाई।
"प्यारी" हारि गई टेरत तौको , रमण टेर नाय एकहु पुराई।

Comments

Popular posts from this blog

हरि आए संग

कहा प्राणन

तुव बिन पिया