सहज सबहु गुरु कृपा
सहज सबहु गुरू कृपा सौ जाना।
पंगु लंङ्घ गयै वन परवत,भव जलधि तरौ कूप समाना।
निपट अपढ भयै ज्ञानी पंडित,भए मूढमति चतुर सुजाना।
मूक भयै वाचाल वाक् पटु,सहज पयै सब वेदनि ज्ञाना।
पंथ भटकै गहै पंथ प्रेम कौ,रस अप्राप्य सहज करि आना।
प्रीति चरणनि होय गूढ हमारी,बाकी योई "प्यारी"आस पुराना।
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