प्रीत रँग

प्रीत रंग
रंगिहै प्रीत रंगहि मनवा।
चढाहि रंग जुगल नाम कौ,जगत रंग छूटिहै।
प्रीत रीत सिखावन वारै,श्यामाश्याम भजिहै।
कर जोरी बिनती इन्ही सौ,इन्ही चरणन गहिहै।
गाढ अति गाढ रंग होये,दीन अति दीन होहिहै।
मिले जुगल जोरी चरण रति,रति को चाह करिहै।

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