अरज

अरज
सुन केशव कहा मेरो मन बोले।
बिन पाहुन नाय,बन बन डोले।
राह कटंक काट काटिले हौ।
तेरो कोमल पाम रसिलै हौ।
हाय सोच सोच मेरो मन डोलै।
हिय राधा चरण तिहारौ हौ।
बिनु पाहुन जब तौ जा रौ हौ।
राधा लग न जावै पथ कंटौलै।
प्यारी सुन नेक मेरो मन की हौ।
गैय्या नाय पाहुन धारे हौ।
जेई बिध ब्रज नंगे पाम डौलै।
तब भली कही तूने माधौ हौ।
हमहु पाहुन नाय धारौ हौ।
प्यारी बलिहारी पिय बड्यौ भौले।

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