कृपा कौर

कृपा कौर
मनहु दैखत नाहि काहै कृपा कौर हौ।
काहै नाहि रहत बनत दीन हीन हौ।
बिनु काज कौर कृपाहु कीजिए।
ऐसौ कौन नाथ अनाथ हमहु कौ।
रसिक रसिली रस प्राण रसिकनि।
स्वामिनि भौरी गौरी राधिके किशोरी सौ।
बिनती करत नित रहत चरणन ठौर।
पलहु नाहि तजु कृपा निज जौरि सौ।
अधमनि होत ताहि लखत न अवगुण।
पड्यौ रहि चरणन ऐसौ रस प्रीत जौरि कौ।
दासी कर जोरि करै बिनती कृपालु सौ।
निजही दासन मे रखिहौ प्यारी कौ।

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