पिय अधर रचावनी

पिय अधर रचावनि विधि अनोखी।
धरै लाल सिंगार साज भलि भाँत सौ,सोहे लालनि लाल संग छब चोखी।
परै कौर अधर नाय लाल रचाए च्यौ,पूछी विस्मय भरी लली प्रियतम टोकी।
सजा मंद मुस्कनि बीरा पिय हाथ कौ,धरी दिन्ही प्यारी मुख पिय अति रोचि।
नव गुलाब दल भए रक्त पीक सौ ,करि दर्शन पिय लगी उर कौचि।
ताई अधर अधर धरै लगै देखि एकौ,अधर पीक प्यारी पिय यौ रचौति।
दोउ रस सिंगार करै ऐहि भाँति परस्पर,"प्यारी" भाँति ऐहि सुख पाई विलोकि।

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