किस बात पर आखिर
किस बात पर आखिर तुमने हमको ऐसी कहानी दी....
भू से भारी जीवन उस पर जीने की सौह(कसम) तुम्हारी ही...
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सुनो क्या हो जाता हम भी जो गर होते तेरे,
तेरी होने की चाहत क्या हमने कुछ ऐसी भारी की.....
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तुम हो मेरे बस हो मेरे चाहा हमने ऐसा भी नही
जीना मरना होकर तेरी बस इतनी चाह बेचारी थी.......
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है कसूर हमारा भी कुछ क्या तुमही आकर बतलाओ ना
तेरी एक छबी ने ही प्यारे यूं दशा खराब हमारी की.......
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अब आओ आकर खुद देखो जैसे भी जो कुछ है करना
कैसे भी कुछ भी करके हो बस करो रिहाई"प्यारी" की......
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