मात पिता न स्वजन भान्म

मात: पित: न स्वजन: भानम्।
देवौ दनुज: शुभाशुभ न ज्ञातम्।
निजस्तित्व भिन्नौ त्वयिनभिज्ञानम्।
जानामि त्वं च त्वं रूपम्।।४।।
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इस देह के माता पिता तथा अन्य संबंधियो का मुझे कुछ पता नही,इस हृदय मे उनके प्रति ममत्व प्रीती न रही।
इसी प्रकार क्या देवता  और क्या राक्षस क्या शुभ और क्या अशुभ इनके विषय मे भी मुझे कुछ ज्ञात नही।
तुमसे भिन्न मेरा कोई अस्तित्व नही तुमसे अलग मेरे अस्तित्व की कोई भी पहचान है ही नही।
मेरे प्यारे जु,मै आपकी प्यारी तो केवल और केवल आपको और  आपके गुण(आपके नयन,आपकी मुस्कान ,आपके श्रृंगार) आपके रूप को ही जानती हूँ,मेरे तो सर्व सर्वस्व आप ही है।

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