निर्मोही रमण

निर्मोही रमण भए काहै।
मोह फंद मौ पे डारिकै निज कौ,भगौ काहै अंगूठौ दिखाए।
सुपन नैन निज संग कौ दिखा कै,काहै लिन्है नैन चुराए।
करि बतिया मिठी मिसरी सी पहिलै,पाछै विषभरौ बिरहा पाए।
प्राण छाडि कै लिन्हौ सब मेरे तै,लैके सब दी जग लौटाए।
का-कौ आसरौ अब "प्यारी" दीन कौ,जई रमणा-ही दीन्ही दुराए।

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