कहि विशाखै लेत जोरि चुटकी

कहि विशाखै लेत जोरि चुटकी।
सखी चन्द्रमुखी तव अधरन रेखा,कहै खास द्युति कछु मुखकी।
देखि सम्मुख मोय तबहु लोभी   , करै छेडा छाडी रस सुखकी।
चकोर प्रीतम धीर धरिहै नाय   ,    द्रुत गति बाढै भूली सबकी।
बेगि अतिही जए निभृत छाडै   ,‌   "प्यारी" चलिहै हाँसी द्वार रूखकी।

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