हिय सुने

हिय सुने
सुणत म्हारा पिव जी म्हारौ हिय कौ।
कही न कही जाणत हिय म्हारी,श्रवणा लगायौ म्हारौ हिय कौ।
पल छिन मनहु टटौलत रहियौ,हौण देत न निकरत मुख सौ।
भाप काढिहौ वा सौ पहलौ पूरियौ,ऐसौ कबहु मिलिहौ पिय हम हौ।
बहण नैन कौ पहिलौ पौछिहौ,फिरिहौ रैन दिनन मौरै संग हौ।
कायसु न वारी जावै ऐसौ प्यारी,पलकन बैठाल्यौ पिय हम कौ

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