मतिहीन मनवा

मतिहीन मनवा
ओ मतिहीन मनवा,पावै न कितहु ठौर।
जग निकरे फसिहै पुनि पुनि हौ,विषय बैरि बैरि चाखे।
देहि बिदैही तू हौहै,काहै रे पुनि पुनि देहि होवन लागै।
हिय रख चरणन जुगल जोरि को,काहै बन पौन सौ भागै।
एकौ ठौर देई दे वृंदावन,नाहि दूजी ओर कहु भागै।
प्यारी बनी बिरहन डोले प्यारै,काहै अबहु भाग ना जागै।

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