बैरन निंदिया
बैरन निंदिया
आग लगे बैरन निंदिया कू,सोवत सारी रैन गमायी।
पिव आये निरखे सखी मोहै,प्रीतीबश न मोय जगायी।
हाय ! मै मतिहीन पाषाण हिय सम,प्रीत पीय की समुझ न पायी।
वो भोरे कछु कही न मौ सो,बिन कहे मौहै काहे समुझ न आयी।
अरी निंदिया तोहै कहा सूझी री,प्रेम जगत कू मोरेआग लगायी।
सुन निंदिया तू सखी जो मौरी,न अईयो इन पलकन माही।
जब लो पिव कू सुख कछु होवे,न अईयो इन पलकन माही।
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