फागुन आयो री सखी

फागुन आयौ री सखी,मन भायौ री सखी , बंधी प्रीतम आवन आस,होवै 
च्यू मनवा उदास।
खिरी कुंज कंज कली,सौंधी पौन सध चली , जगै सोयै अबिकै ह्यौ भाग,होवै च्यू मनवा उदास।
सूनौ उर रंग भरयौ, कूची कर पिय लयौ , अंग- अंग लिखा लउ नाम,होवै 
च्यू मनवा उदास।
सोचि भरि पुलक गात, बेगि जावै बिरह रात , आवन सुनै धरि मग कान, होवै च्यू मनवा उदास।
आवै पिय जो अरी,करू कहू सगरी , "प्यारी" येई जिवावै प्राण,होवै 
च्यू मनवा उदास।

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