आवत देखी

आवत दैखि
आवत दैखि मुरारी।
गागर लेत चलिहै गौरि,नैन ढूढत श्याम रसीलै।
दूरि सौ आवतो दैखि सखीहि,आय मटकत चलत छबिलै।
रोकेहु नाहि रूकिहै चितवनि,नैन लडिहै नागर जाय।
बिसरत सुधि छूटत गगरी,लोक लाज बचीहु नाय।
धम्म सौ फूटिहे माट कौ मटकी,नाही टूटिहै तबहि ध्यान।
इक तौ छबि छबिली ऐसौ,वा पै मारी मोहन मुस्कान।
गई गुजरी काम सौ अबतौ,जौई छूटै सौई छूटै।
प्यारी अंग लगाहौ कदसी,काय बैठिहौ हम सौ रूठै।

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