चल ब्रजधाम
चल ब्रजधाम
चल रे मना ब्रजधाम।
लाडली लाल जहाँ एक रूप होय,रहवै सदा सुखधाम।
रस सौ रगे पगे रसिकवर,करत किलोल जहाँ।
जमुना पुलिन बहत रस निर्मल,करै रस टहल उहाँ।
जूथ सखिन सेबा आठ पहर को,घूमै ही चकरी सी।
रसिकन संतन चरण रज जहाँ,रस भरी सुधा सम सी।
सोई ब्रजधाम बास मिलै मोहै,पावू ताई चरण बिश्राम।
कर जोरि बिनती शीश धरै रज प्यारी,करू टहल जोरि आठो याम।
Comments
Post a Comment