पिय प्यारी छाह
पिय प्यारी छाँह
आली पिय प्यारी छाँह होहि।
दुई देह ज्यौ वाकी छाँवली,तैसेई जानिहौ सखी ओ सहेली।
जलहि शीत ज्यौ बिलग ना होहि,त्यौहि सखिन पिय प्यारी ना बिछोहि।
ज्यौ तापहि अगन संग रहिहै,सखी राधा अंग ही कहिहै।
द्युति जो चमक बिलग ना करिहै,सखी ताई ऐसेही एक होहिहै।
और जानौ जैसौ चले नासिका सुगन्धि,त्यौ सखी प्रीती कौ ही राह चलिहै।
नवाय शीश सखी सहेली प्यारी,जुगल टहल हमहु कौ रखिहै।
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