बड़ भाग रमण रस पाई
बड भाग रमण रस पायी।
अथाह अनंत जनम प्यासी पै,दई सहज कृपा बरसाई।
गढी मूरत माटी भरी रस तै,भरि इतनोई जाए छलकाई।
जासौ मिलू बाँटू सबमै प्रीति,बाटू जितनोई बढि पुनि आई।
मिलि रमणा भई रमणाहु अब तौ,लिन्ही प्रेम सौ निजमै मिलाई।
बलि बलि बलिहारी "प्यारी" तौ,निज रमणा प्रेम बलि जाई।
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