यो तो उन्हें भी
यूं तो उन्हे भी हमसे है मोहब्बत बहोत
लेकिन जुबान-ऐ-लफ्ज वो कह पाते नहीं है.....
हल्का हया का परदा है ओढ़े हुए और
हम इसे ओर अब तो सह पाते नहीं है......
माना मासूम है लेकिन माशूक भी तो है न
तो क्यू आके रस्म-ऐ-माशूक वो निभाते नहीं है.....
काश! के बेपर्दा हो तुम और सिजदा करू मैं
संग अश्को के ख्वाब यही बस बह पाते नही है....
क्या हकीकत भी होंगे "प्यारी-ऐ-ख्वाब" दिल के
क्यूकी,अब तक के किसी फसाने में वो आते नहीं है....
जानते हैं तुम न कभी जवाब तलब होंगे
तो सवाल क्यू ये काबू मे रह पाते नहीं है.....
तो सवाल क्यू ...…..
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