उधौ कहिहो

उधौ कहिहौ
उधौ कहियौ श्याम सो जाय।
जहाँ रहि हिय मोद राखिहै,तनिक न करियो खेद।
कई देह भयै प्राण एकहु,नाहि लेस कछु न भेद।
परस्यौ आवन तौरि बात कही पै,बिसराय दउ सबे बेद।
नाहि बिचारिहौ ग्वारिन गोपिन,नाहि करियौ जाद हेद।
सूख्यौ तन अधर भयौ प्राण,ता पै बिनु दैख्यौ नाहि निकरिहै।
रहिहौ मथुरा निश्चिंत होहिहै,आवन लौ प्राण सम्हारत रहिहै।
नंदनंदन सुत जशोदा प्यारै,गोपिन वारिहै प्राण।

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