चेतना
चेतना
भजन बिनु चौपाया सम जीवन।
गदहा ज्यौ बौझि ढोवत,जनम सोई भार सम ढोवन।
खावत सोबत समय बितावत,नाय दूजौ करियौ काम।
गिद्ध ज्यौ ललचात माँस कौ पाछै,त्यौ बिषयन होय सकाम।
शूकर ज्यौ मिष्ठान्न छाडिहै,धरत मुख गंदले जल होय।
त्यौ बिनु भजन सुनि री प्यारी,इहा उहा लोक सबै खोय।
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