सखी बिन राधारमण

सखी!बिन राधारमण मन कैसो लागै।
नैनन जिनके फसि एक बार हिय,बार बार इन तकन-हु भागै।
जिनके अधरन के मौन मौन पै,जग की कही एक तै लाख ना लागै।
बंकिम कटि जिनकी देख कै मनवा,गति सुधी तज टेढि चालहु चालै। 
पद कंज तकि छणहु जिन मन,नाय दूजै ठौर ओर अब लागै।
ऐसौ रसखानि पिय फसि सखी री,"प्यारी" सौवै नाम इन इन्हु तै जागै।

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