कैसो नाथ पुकारूँ
कैसो नाथ पुकारू सुनौ अरज जौ मौरी।
रोए पुकारी हसिकै पुकारी,भाँति दौनोई रही मोरी आस अधूरी।
प्रेम करिकै पूजिकै पुकारी,मानी तौहे सरबस तऊ भई ना मै पूरी।
थमिकै पुकारी भाजिकै पुकारी,दौरी छूवन दैखि ऐसो भाँति हौ बौरी।
ताप सहिकै "प्यारी" पुकारी,तैने सुनि नाही रमणा गई सब कोरी।
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