था मनहूस दिन वो
था मनहूस दिन वो, बर्बादियों की रात थी.......
तुम ही कहो इसमे फिर,जश्न की क्या बात थी।
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जां जिस्म से जुदा हुई,सांसे जहर धुंँआ हुई.......
नेमत कहे कैसे इसे,ये हमपै तो सजा हुई।
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कहते थे जिसे जिंदगी,है मौत से बदतर वही......
तय करने मे जिसे कभी,हमारी ना रजा हुई।
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चलो मान ले इसमे खुशी,तुमको है कुछ ना कुछ कही....
पर वो खुशी क्यूं आज तक,हमसे नही बयां हुई।
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आए तो आए सही,तेरी हर पल मगर यादे नही......
क्यूं आपसे ज्यादा हमे, दुनिया ये हमजदां हुई।
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इस पर अकेले ही हमे,क्यूं आपने रहने दिये.....
छुपकर के क्यूं हमसे रहे,क्या हमसे कुछ खता हुई
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ओर फिर है ये भी बात के,अरसा हुआ बिन आपके...
अब लौटा लो "प्यारी" बूंद को,आप सागर से जो जुदा हुई।
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