चंचलि चितवनि
चंचल चितवनि दैखे प्यारी।
भाजति कुंजन थमि मुर दैखे,देखत खौलिकै रस को पिटारी।
दैखत विहस कै पिय ललचावै,नैननि झुका बनी छबी मनहारी।
ठगे से ठाकुर शिथिल हर अंगनि,ठगौरी रूप प्यारी ऐसी डारी।
"प्यारी" पै कृपा उन नैननि राखौ,जाकी झलक इक हारे बिहारी।
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