कहत न बने
कहत न बनै
हिय पीर कहत न बनै।
का सौ माधौ तुव बिन कहवू,बिनु तुव कोऊ नाहि सुनै।
पानीही भीतर प्यासी रहवू,हिय इकलीही बात गुनै।
कबहु कबहु सबै सूनौ हौवै,पिय ढौंढत नाय मिलै।
बात न बौलै दैखिहै नाय,काय अधर तैने सिलै।
हा माधव बिनु सबहि सूनौ,अग जग सबै सारै।
पिय बिनु सबहि सतावै मोय,मोय तानै सबै मारै।
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