रस को निकुंज कुंज जोरि रस विहरै है,
रस को निकुंज कुंज जोरि रस विहरै है,रस सो ना दूजा नाम नेम इन ज्ञान है।
रस खावै रस पीवै भोज करै रसकोई,साग येई रोटि येई येई मिष्ठान है।
देखन सुनन बतरावनि है रस की ही,चलन झुकन अरु रस को बैठान है।
नयन अधर शिरा हिय बनै रस है,वपु रस धारै से रसकोई भान है।
रस बनी सेज पे बिछावनि भी रस की है,औढे रस करै आपस रस दान है।
करै दान रस को रसीली रस जोरि ऐसी,ऐसी प्यारी रसिकनि पिय रसखान है।
बात इतनी सी रस सरबस इनकोई,सखी रस जोरि"प्यारी" मान अभिमान है।
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